!! जय भास्कर !!

Wednesday, July 13, 2011

आसान घरेलु उपाय

आंखों के आगे अंधेरा होना, चक्कर आना, बाहरी दृश्य हिलते हुए, घूमते हुए या उल्टे सीधे नजर आना.....इसी तरह की जाने कितनी ही समस्याएं हैं जिनका सीधा संबंध हमारी आंखों से होता है। एकाएक खड़े होने, झुकने या तेजी से घूम जाने पर अचानक आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है। प्रकाश होते हुए भी अंधेरा लगना या चक्कर आने के कई शारीरिक और मानसिक कारण होते हैं।

शरीर का किसी बिमारी से ग्रसित होना, कमजोरी और थकावट होना, क्षमता से अधिक शरीर से काम लेना,

नींद का पूरा न होना, आंखों के लिये आवश्यक प्राटीन्स औ विटामिन्स की कमी हो जाना आदि प्रमुख कारण हैं जिनके कारण यह समस्या पैदा होती है। नीचे दिये जा रहे कुछ कारगर उपायों को करने से इस रोग में तत्काल लाभ होता है-

-हरी पत्तेदार शब्जियों और सलाद का सेवन करें।

-प्रतिदिन 1 गिलास दूध में एक चम्मच घी डाल कर पीएं।

-रात को पानी में गलाकर रखी हुई दो बदाम सुबह खूब चबा-चबाकर खाएं।

-अंकुरित अन्न का प्रतिदिन नाश्ता करें।

-जितना संभव हो जल्दी सोएं और जल्दी उठें।

इन आसान घरेलु उपायों को तो अपनाना ही चाहिये पर साथ ही तुरंत ही चिकित्सक की सहाल भी अवश्य लेना चाहिये।

Tuesday, July 12, 2011

हिन्दू धर्म


हर इंसान जीवन के हर पलों में सुखों की आस करता है। ईश्वर से प्रार्थना, दुआओं, आशीर्वाद या कर्म हर कहीं खुशियों को पाने की गहरी चाहत होती है। इस तरह इंसान जागते हुए ही आनंद और रस नहीं चाहता है, बल्कि सुकून और चैन से भरी नींद भी सुख की कामना में शामिल होती है। लेकिन सच यही है कि नींद यानी शयन तभी बेचैनी से मुक्त होता है जब जागरण संयम से भरा हो।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा बताए गए व्रत, त्यौहार सुख के लिए संयम और संतुलित जीवन शैली को अपनाने का संदेश और सीख देते हैं। इसी कड़ी में हिन्दू माह आषाढ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी (11 जुलाई) से कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी (6 नवंबर) के बीच के चार माह चातुर्मास के रूप में प्रसिद्ध है। जिसमें धर्म और संयम को अपनाकर जीवन में रस, आनंद और सुख कायम रखने का संदेश भी है।

धार्मिक मान्यताओं में ये दोनों तिथियां भगवान विष्णु के शयन और जागरण की घड़ी मानी जाती है। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी (11 जुलाई) से अगले चार माह तक भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर सोने के लिये क्षीरसागर में चले जाते हैं। इसलिए इस दौरान अनेक मांगलिक कार्य नहीं होते। जैसे गृह प्रवेश, विवाह, देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा, यज्ञ-हवन, संस्कार आदि।

प्रतीक रूप में भगवान विष्णु का यह शयन मौसम के बदलाव में स्वास्थ्य और व्यावहारिक जीवन को सुखद बनाने के लिए जीवनशैली को साधना सिखाता है। खासतौर पर धर्म आचरण से जुड़कर।

इसी क्रम में माधुर्य यानी आनंद, सात्विक स्वरूप भगवान विष्णु के नाम स्मरण का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान विष्णु और उनके अवतार जगत के सुख और कल्याण का कारण बने। जिनमें श्रीकृष्ण और श्रीराम के कर्म और मर्यादा के सूत्र हर काल में सुखी जीवन के बेहतर उपाय माने गए हैं।

यहां देवशयनी एकादशी और चातुर्मास की घड़ी में मन, वचन, व्यवहार को साधने के लिए भगवान श्री कृष्ण, श्री राम के रूप में भगवान विष्णु के ध्यान का सरल मंत्र बताया जा रहा है, जिसका आप अकेले या परिवार, इष्टमित्रों के साथ बैठकर भी ध्यान करें तो तनाव, दबाव व परेशानी से मुक्त जीवन का सुख ले पाएंगे -

- चातुर्मास के दौरान यथासंभव प्रतिदिन भगवान विष्णु की गंध, चंदन, पीले फूल, नैवेद्य अर्पित कर सुगंधित धूप व दीप जलाकर इस आसान मंत्र का जप करें -

अच्युतं केशवम् रामनारायणम्

कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम्

श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभम्

जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे

- मंत्र जप या भजन के बाद विष्णु आरती कर प्रसाद जरूर ग्रहण करें।

उत्तर | इस वार्तालाप पर 961 सहभागी

JAI SHREE RADHEY KRISHNA


मौत और मौत के बाद की दुनिया की जितनी भी कल्पना की जाए उसका सही अनुमान लगाना काफी मुश्किल है। मरने के बाद क्या वाकई कोई यमपुरी है जहां आत्मा को ले जाया जाता है? या फिर आत्मा को खुद ही वहां पहुंचना होता है। उसका रास्ता कैसा है? यमपुरी या यमलोक जैसी कोई दुनिया है? या यह केवल कपोल कल्पना मात्र है। ऐसे कई सवालों का जवाब हमारे धर्म ग्रंथों में मिलता है। आइए जानते हैं कि यमलोक के बारे में हमारे धर्म ग्रंथ क्या कहते हैं।



ऐसा है यमपुरी का नजारा



यमपुरी का उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है। जिसमें गरूड़ पुराण, कठोपनिषद, आदि में इसका विस्तृत विवरण मिलता है। मृत्यु के 12 दिन बाद आत्मा यमलोक का सफर शुरू करती है। इन बारह दिनों में वह अपने पुत्रों और रिश्तेदारों द्वारा किए गए पिंड दान के पिंड खाकर शक्ति प्राप्त करती है। बारह दिन बाद सारे उत्तर कार्य खत्म होने पर आत्मा यमलोक के लिए यात्रा को निकलती है। इसे मृत्युलोक यानी पृथ्वी से 86000 योजन दूरी पर माना गया है। एक योजन में करीब 4 किमी की दूरी होती है।



यमलोक के इस रास्ते में वैतरणी नदी का उल्लेख भी मिलता है। यह नदी बहुत भयंकर है, यह विष्ठा और रक्त से भरी हुई है। इसमें मांस का कीचड़ होता है। अपने जीवन में दान न करने वाले मनुष्य मृत्यु के बाद यमपुरी की यात्रा के समय इस नदी में डूबते हैं और बाद में यमदूतों द्वारा निकाले जाते हैं।

यमपुरी का रास्ता बहुत लंबा है, आत्मा सत्रह दिन तक यात्रा करके 18वें दिन यमपुरी पहुंचती है। यमपुरी में भी एक नदी का वर्णन मिलता है, जिसमें स्वच्छ पानी बहता है, कमल के फूल खिले रहते हैं। इस नदी का नाम है पुष्पोदका।



इसी नदी के किनारे एक वटवृछ है जहां आत्मा थोड़ी देर विश्राम करती है। तब तक उसे शरीर त्यागे पूरा एक महीना बीत चुका होता है और इसी वटवृक्ष के नीचे बैठकर वह जीव पुत्रों द्वारा किए गए मासिक पिंडदान के पिंड को खाता है। फिर कुछ नगरों को लांघकर यमराज के सामने पहुंची है। वहां से आत्मा को उसके कर्मों के अनुसार दंड या सम्मान मिलता है।



यम लोक एक लाख योजन क्षेत्र में फैला माना गया है। इसके चार मुख्य द्वार हैं। पूर्व द्वार योगियों, ऋषियों, सिद्धों, यक्षों, गंधर्वों के लिए होता है। यह द्वार हीरे, मोती, नीलम और पुखराज जैसे रत्नों से सजा होता है। यहां गंधर्वों के गीत और अप्सराओं के नृत्य से जीवात्माओं का स्वागत किया जाता है। इसके बाद दूसरा महत्वपूर्ण द्वार है उत्तर द्वार जिसमें विभिन्न रत्न जड़े हैं, यहां वीणा और मृदंग से मंगलगान होता है। यहां दानी, तपी, सत्यवादी, माता,पिता और ब्राह्मणों की सेवा करने वाले लोग आते हैं।



पश्चिम द्वार भी रत्नों से सजा है और यहां भी मंगल गान से जीवों का स्वागत होता है। यहां ऐसे जीवों को प्रवेश मिलता है जिन्होंने तीर्थों में प्राण त्यागे हों या फिर गौ, मित्र, परिवार स्वामी या राष्ट्र की रक्षा में प्राण त्यागे हो। यमपुरी का दक्षिण द्वार सबसे ज्यादा भयानक माना जाता है। यहां हमेशा घोर अंधेरा रहता है। द्वार पर विषैले सांप, बिरूछु, सिंह, भेडि़ए आदि खतरनाक जीव होते हैं जो हर आने वाले को घायल करते हैं। यहां सारे पापियों को प्रवेश मिलता है।



जीव का पुनर्जन्म



हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार जीव को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। अपने पिछले जन्म के कर्मों का फल तो वह नर्क की यातनाओं से भोगता है और कुछ उसे अपने अगले जन्म में भोगना पड़ते हैं। इस बारे में ज्योतिष शास्त्र का अपना अलग मत है। गरूड़ पुराण के अनुसार जीव पहला शरीर छोडऩे के बाद पहले अपने कर्मों के अनुसार फल भोगता है। उसे तरह-तरह की यातनाएं दी जाती हैं। कई वर्षों तक नारकीय यातनाओं के बाद उसे फिर जन्म दिया जाता है।



वह अपने कर्मों के अनुसार ही स्वर्ग भी पाता है। यहां स्वर्ग की भी कई श्रेणियां मानी गई हैं। जिसमें से मध्यम श्रेणी के स्वर्ग का अधिपति इंद्र को माना गया है। इससे भी ऊंचे स्वर्ग माने गए हैं। अच्छे कर्मों के कारण जीवों को यहां सुख भोगने को मिलता है। सुख भोगने के बाद भी उसकी अवधि समाप्त होने पर उस जीव को दोबारा जन्म लेना पड़ता है।



वहीं ज्योतिष शास्त्र का विचार थोड़ा ज्यादा तर्कसंगत और वैज्ञानिक है। ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि कोई भी जीव दूसरा जन्म तब लेता है जब उसके पूर्व जन्म के कर्मफल के अनुसार ग्रह दशाएं बनती हैं। तब वह जीव अपनी माता के गर्भ में आता है और फिर वैसे ही मिलते-जुलते ग्रह नक्षत्रों में वह जन्म भी लेता है। इसकी कोई अवधि निश्चित नहीं होती है। इसमें सदियां भी लग सकती हैं।